मंचीय नारीवाद बनाम ज़मीनी नारीवाद: असली लड़ाई कहाँ है?
काम के सिलसिले में बांदा जिले के कालिंजर गांव जाना हुआ। शहर से दूर एक गांव इतिहास समेटे खड़ा है सारा दिन इतिहास के पन्नों में गोते लगाते हुए जब तेज भूख का एहसास हुआ तो गाड़ी किसी ढाबे की तलाश में मुड़ गई और हम जा पहुंचे एक छोटे से ढाबे में। शहर में बसने वाले ढाबों से कहीं अलग, यह पुराने समय में अटका हुआ सा मालूम हुआ। एक प्रौढ़ सी महिला गोल-गोल रोटियां चूल्हे पर सेंक रही थी और दो युवा उनकी मदद कर रहे थे। हमारे साथ गांव के ही डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर साथ थे जिन्होंने हमारे आने की सूचना पहले ही दे दी थी। बैठकर उस स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेते हुए मैंने अचानक ही पूछा, ढाबा है किसका? वहां मौजूद युवक युवक ने मेरी थाली में रोटी डालते हुए कहा अम्मा चलाती हैं। हम लोग मदद करते हैं।”
इस पर चूल्हे में रोटी सेंकते हुए महिला ने मुस्कुराकर मुझे देखा। खाने के बाद उनसे बात करने का लोभ छोड़ नहीं पाई और उनसे पूछा,”नाम क्या है आपका?”
“हमार नाम…”, इसके बाद वह 10 सेकंड के लिए रुकी चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट आई और बोली “आशा! यही खाना बना के सेवा करत हैं ”
“….” , मैं घी-गुड़ की मिठास को भीतर महसूस कर रही थी।
“खाना बनाना अच्छा लगता था, इसलिए यह काम शुरू किया। गांव में अपने ही खेत का गेहूं और दाल हैं । अब तो बहू भी आ गई है लेकिन उसे सिलाई का शौक था इसलिए उसे सिलाई सिखाए हैं वह आसपास के लोगों के कपड़े सिलती है कहती है कुछ सालों में सिलाई की दुकान खोलेगी”
उनसे बात हो ही रही थी कि फोन बजा दूसरी तरफ अंकिता थी।बेटी को स्कूल से पिकअप के बीच कॉल कर रही थी। दिल्ली में डिजिटल मार्केटिंग की कंपनी चलती है सोशल मिडिया , नई वेबसाइट का पैटर्न स्ट्रक्चर डिस्कस करते हुए उसने अपनी टीम के साथ अच्छा काम करने की तसल्ली देते हुए फोन काटा।
आशा और अंकिता मेरे लिए दोनों ही सशक्त स्त्रियों की छवियां थीं। हो सकता है मंचीय सशक्त स्त्री की परिभाषा में दोनों फिट न बैठे क्योंकि “किंतु अगर मगर यह वह ” ऐसे तमाम सवालों को सशक्तिकरण की सीधी राह पर रोड़ों की तरह खड़ा कर दिया गया है। जाने कब, कैसे और क्यों सशक्त महिला की छवि पश्चिम से प्रेरित हो गई। बीते समय की तमाम कुरीतियों के बावजूद सशक्तिकरण भारतीय परिपेक्ष में पश्चिम से ली हुई अवधारणा नहीं हो सकती। हां एक मुहिम के तौर पर उसे यकीनन पश्चिम ने मान्यता दिलाई।
बीते कुछ वर्षों में स्त्री सशक्तिकरण एक मुहिम के रूप में भारतीय समाज का हिस्सा बानी हालांकि स्त्री शिक्षा और अधिकार भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है जो कि बाहरी आक्रांताओं और अंग्रेज़ी राज के समय प्रभावित और क्षीण हुआ। किंतु सावित्री बाई फुले जैसी पुरखिनों ने शिक्षा का बीड़ा उठाया जिसमें उनके पुरुष साथियों ने भी मदद की। बीते सौ वर्षों में भारत में स्त्री शिक्षा का स्तर तेज़ी से बढ़ा और संविधान में समान अधिकार भी दिए गए किंतु सशक्त स्त्री और लैंगिक समानता अभी भी एक अधूरा लक्ष्य है।
नारीवाद का मूल उद्देश्य पुरुषों के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि महिलाओं और पुरुषों के लिए समान अवसर, सम्मान और अधिकार सुनिश्चित करना है।
बराबरी की इस मुहिम में सबसे पहले ये स्वीकारना होगा भारत में आज भी महिला सुरक्षा , शिक्षा, रोजगार, नेतृत्व और सामाजिक मान्यताओं के स्तर पर अनेक ऐसी बाधाएँ मौजूद हैं जो महिलाओं की प्रगति को सीमित करती हैं।
महिलाओं के खिलाफ अपराध
भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध एक गंभीर सामाजिक समस्या है। National Crime Records Bureau के अनुसार 2022 में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के लगभग 4.45 लाख मामले दर्ज हुए। इनमें घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और छेड़छाड़ प्रमुख हैं।ये आंकड़े जाति-धर्म में समभाव से मौजूद हैं। बारीकी से देखें तो अधिकतर मामले घर और जानपहचान के लोगों द्वारा किए गए अपराध हैं। अलग-अलग मामले कुल मिलाकर उस सोच को परिलक्षित करते हैं जो स्त्री को मात्र भोग्या मानती है। अपराध की यह स्थिति बताती है कि महिलाओं की सुरक्षा और जागरूकता के लिए सख्त कानून और सामाजिक बदलाव आवश्यक हैं।
लैंगिक भेदभाव की जड़ें
भारतीय समाज में लैंगिक भेदभाव महीन स्तर पर दिखाई देता है। पढ़े लिखे परिवार में भी कई दफा जन्म से पहले ही बेटियों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण देखने को मिलता है। शोध के अनुसार 2017 से 2030 के बीच भारत में लगभग 6.8 मिलियन “मिसिंग फीमेल बर्थ्स” का अनुमान लगाया गया है, जो पुत्र-प्राथमिकता की मानसिकता को दर्शाता है। ये हकीकत इसी समाज की है जहां आज भी “कोई बात नहीं समझो लक्ष्मी आई है”, ऐसा कह कर बेटी के जन्म पर बधाई कम तसल्ली अधिक दी जाती है।
यह मानसिकता आगे चलकर शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के अवसरों में असमानता पैदा करती है। ऐसे सामाजिक ढाँचे में नारीवाद की ज़रूरत ज़मीनी स्तर पर है!
शिक्षा तक पहुँच की चुनौतियाँ
“घर से स्कूल या कॉलेज दूर है, कोई ऊंच नीच !”
“लिखना-पढ़ना आ तो गया, अब क्या कलेक्टर बनाना है?”
“ज़्यादा पढ़ने से इतना पढ़ा-लिखा लड़का कहां मिलेगा? और मिल गया तो दहेज!!”
“पढ़ लिख कर क्या क्या करने लग जाती है पता है न !!”
ये सभी कथन लड़कियों की शिक्षा से जुड़े हैं । हालाँकि भारत में लड़कियाँ पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं, सीबीएसई के आँकड़ों के अनुसार कई वर्षों से कक्षा 10 और 12 में लड़कियों का पास प्रतिशत लड़कों से अधिक रहा है।
फिर भी वास्तविकता यह है कि कई लड़कियाँ सामाजिक कारणों, आर्थिक दबाव या पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उच्च शिक्षा तक नहीं पहुँच पातीं। उदाहरण के लिए, यदि किसी लड़की का विवाह 19 वर्ष से पहले हो जाता है तो केवल लगभग 24% ही उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं, जबकि देर से विवाह करने वाली लगभग 78% लड़कियाँ पढ़ाई पूरी कर लेती हैं। नारीवाद केवल शिक्षा की उपलब्धता की बात नहीं करता, बल्कि उन सामाजिक संरचनाओं और सोच को भी चुनौती देता है जो लड़कियों की पढ़ाई को गैर ज़रूरी मानती हैं।
वेतन असमानता या पे डिस्पैरिटी
वेतन असमानता पर तो बात भी हालिया शुरू हुई है । कुछ वर्षों पहले फिल्म अभिनेत्री करीना कपूर ने इस मुद्दे को फिल्म के परिपेक्ष्य में उठाया तो कई उच्च पदासीन स्त्रियों ने अपने अनुभव साझा किए। भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं को अभी भी समान वेतन नहीं मिलता। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार कई क्षेत्रों में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में लगभग 16% कम वेतन प्राप्त करती हैं। यहां केवल मज़दूरी के स्तर पर नहीं बल्कि उच्च कॉर्पोरेट के आंकड़े भी सम्मिलित है। इंडिया टुडे की हाल की एक रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लगभग 34% महिलाओं को लगता है कि कार्यस्थल पर समान वेतन की व्यवस्था अभी भी नहीं है।
यह अंतर केवल आर्थिक असमानता नहीं बल्कि सामाजिक सोच का भी परिणाम है, जहाँ महिलाओं के काम को कम महत्व दिया जाता है और कई दफा तो उनके लिए निर्णय पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया जाता है। घरेलू स्त्री के काम ‘अनपेड ‘ है तो उसे जीडीपी का हिस्सा ही नहीं मन जाता न ही उसका ‘क्रेडिट ‘ मिलता है।
ज़मीनी नारीवाद इस असमानता को समाप्त कर आर्थिक न्याय एवं सम्मान की मांग करता है।
नेतृत्व पदों पर महिलाओं की कम भागीदारी
आप उच्चस्थ पदों पर नज़र डालिए और देखिए कितनी महिलाएं हैं जो उस मकाम तक पहुँच पाई हैं? ऊपर की सारी वजहें इसमें शामिल है। आज भी उच्च नेतृत्व पदों पर महिलाओं की संख्या बहुत कम है। भारत में वरिष्ठ नेतृत्व पदों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 13.6% के आसपास है। 10 % कंपनियों में एक भी स्त्री नेतृत्व पद पर नहीं है। मात्र 20 % कंपनियों जेंडर बैलेंस देखने को मिलता है। द इकनोमिक टाइम्स के अनुसार कई कार्य क्षेत्रों में ‘बोर्ड’ स्तर पर महिलाओं की भागीदारी केवल लगभग 17% तक सीमित है।
यह स्थिति बताती है कि महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान अवसर नहीं मिल पाते। नारीवाद का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं बल्कि नेतृत्व और नीति निर्माण में भी महिलाओं की बराबर भागीदारी सुनिश्चित करना है क्योंकि जब महिलाएं नीतियां बनाएंगी तब वो उसे ‘फ्लेक्सिबल और इंक्लूसिव ‘ रख उसमे समाज के हाशिये पर खड़े शख्स का भी हिस्सा सोचेंगी ।
बाज़ार का हस्तक्षेप
जहां एक ओर स्त्री को प्रकृति एवं सौंदर्य की प्रतिमूर्ति माना गया है वहीँ बाजार के रूप में , समाज और मीडिया ने महिलाओं के लिए ऐसे सौंदर्य मानक बनाए हैं जो अक्सर अवास्तविक होते हैं।गोरे होने की क्रीम से लेकर पतले होने की दवा। अब तो उम्र रोकने की कोशिश की उम्र भी घट कर मात्र पच्चीस हो गयी है। “सुंदर” दिखने का दबाव लड़कियों के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को प्रभावित करता है। एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 34 % टीनएज लड़कियां अपने आप की छवि से संतुष्ट नहीं है और स्वयं के प्रति एक नकारात्मक भाव ले कर बड़ी हो रही है। परिणामस्वरूप कई युवा महिलाएँ अपनी योग्यता और प्रतिभा के बावजूद स्वयं को कमतर समझने लगती हैं।
ज़मीनी नारीवाद इस सोच को चुनौती देते हुए यह संदेश देता है कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी क्षमताओं, विचारों और व्यक्तित्व से तय होना चाहिए, न कि केवल उसके बाहरी रूप से।
मंचीय नारीवाद बनाम ज़मीनी नारीवाद
ऊपर दिए गए तमाम मुद्दे निरंतर हस्तक्षेप और समर्थन के स्वर की मांग करते है। किन्तु नारीवाद की जो आवाज़ शहर गाँव,पत्र- पत्रिकाओं और सोशल मिडिया फिल्मों आदि में गूंजती है वो इनसे कहीं दूर है और कदाचित इनसे अनभिज्ञ भी मालूम होती है।
आज आज़ादी और बराबरी के नाम पर (कई ) पुरुष द्वारा किये गए हर कुत्सित काम को सशक्त होने से जोड़ लेने की पुरज़ोर कोशिश है- चाहे वो सिगरेट हो या शराब या बिस्तर पर बदलते साथी अथवा विवाहेतर संबंध को प्रेम का नाम दे कर सामाजिक इकाई के रूप में परिवार को खोखला बनाना । स्त्री को नग्न देखने की वृत्ति पुरुष की प्रकृति है किन्तु अब स्वयं कपडे उतार कर,’सौंदर्यात्मक नग्नता” को सशक्तिकरण का पर्याय बनाने के लिए तमाम बाजार, मंच और कलम कार्यरत है।नारीवाद केवल महिलाओं का आंदोलन नहीं, बल्कि लैंगिक समानता और प्रगतिशील समाज की दिशा में आवश्यक कदम है जिसमे स्त्री-पुरुष की बराबर भागीदारी आवश्यक है । ऐसे में नारीवाद को ‘पुरुषविरोधी’ जामा पहनाना भी कुछ मंचीय नारीवाद पुरोधाओं की निजी कुंठा है। स्वयं को सामाजिक सुधार एवं नारीवाद का केंद्र मान इस मुहीम को निम्तम बाज़ारू स्तर पर ला कर उसे कमज़ोर कर दिया।
मंचीय नारीवाद अधिकतर बड़े होटल हॉल अथवा एसी कमरे के सेमिनार में तय करता है की 1800 किलोमीटर दूर एक स्त्री, जो शायद मात्र कुछ वर्ष पहले चूल्हे से हट कर सिलिंडर तक पहुंची है,और कदाचित अपने परिवार की पहली शिक्षित महिला है , उसे उसके ‘अधिकार ‘ बताने है ताकि वो देर रात गाँव कस्बे या टियर थ्री के शहर में ‘बेफिक्र ‘ घूम सके! महिला सुरक्षा पर भी मंचीय नारीवाद चयनात्मक या कहें कि वर्ण आधारित शैली में आवाज़ उठाता है। कुल मिलाकर अजेंडे का खांचा कमज़ोर न पड़े भले नारीवाद के असल मुद्दे दम तोड़ दें।
भारतीय समाज में नारीवाद ,फिलहाल एक बारीक़ रस्सी पर चल कर स्वयं को बचाने की मुहीम में भी जुट गया मालूम होता है, जहाँ उसे खुद को ‘बेफिक्र बाज़ार, कोलाहलमय मंच और उच्छृंखल कलम से अबाधित हो कर उस लक्ष्य तक जाना है जिसके लिए सुदूर दो जोड़ी आँखे स्वप्न देख रही है।
